गुरुवार, 15 सितंबर 2011

मगही साहित्य ई -पत्रिका अंक १


     मगही मनभावन
         मगही साहित्य ई-पत्रिका - 1
   वर्ष-1                 अंक - 1             माह - सितम्बर 2011
------------------------------------------------------------------------------------------
ई अंक में......
कहानी
बेटवा हमरे, पुतोहियो हमरे - तारकेश्वर भारती
मनाही - डॉ0 किरण  शर्मा
कविता
हे भू जननी - कारू  गोप
हर हस्ती हमर हिमालय हइ - मथुरा प्रसाद नवीन
गीत
बदरिया गावऽ है कजरिया,
तोहरा देखली सपनमा में भोरे-भोरे - जयराम सिंह
गजल
दीनबन्धु के तीन गजल
पुस्तक समीक्षा
आखिर कहिया तक - डॉ0 शिवेन्द्र नारायण सिंह
रिर्पोट
मगध विश्विधालय स्नातकोत्तर मगही विभाग के प्रथम स्थापना दिवस समारोह

------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------------------
दू गो बात.........

                                              मगही के प्रचार-प्रसार लेल -माघ्यम से मगही के सशक्त कलमकार के रचना अपने तक पहुंचावे लेल मगही मनभावन एगो प्रयास हे अंक में पूजा के अक्षत नियर थोड़े सन रचना लेके प्रस्तुत होलिये हऽ स्तरीये आउ दमदार रचना अपने सभे के मिलते रहतइ ईहे वादा के साथ-साथ निहोरा करऽ  हियै कि अप्पन सुझाव आउ अभिव्यक्ति से  अवगत करैते रहथिन, ताकि सच्चे में  अपने सभे के मनभावन बन सकै 

                                                                                                   उदय कुमार भारती

1. रचना मगही साहित के प्रचार-प्रसार आउ नयका पीढ़ी के पास पहुंचावे के लेल इहां रखल गेल हऽ
2. रचना साभार लेल  गेल  हऽ गलती ले माफी आउ अगाह करे के निहोरा                                                                 
------------------------------------------------------------------------------------------
कहानी                  
             बेटवा हमरे, पुतोहियो हमरे 
                                            तारकेश्वर भारती                                                                                                      
           पौ फटबे कैल हल कि झन-झन-झन थाली बजे लगल भुनेसर के घर में, आउर होवे लगल कि भुनेसर के घर वाली के बुतरू होल हऽ । आय-माय-दाय के भीड़ लगे लगल, बुतरू के मुंह देखेला । तुलाही चाची बोललन - "पांच बरीस पर अंचरा खुलल बेचारी भुनेसर वाली के; संकर जी के किरपा भेल; जिये, बचे, लखिया होवे ।" धुरियारी मामा कहलन -"लेल-देल के बप्पे नियर होतै छौंड़ा ।" कंझली फुआ कह उठलन --"नञ् चाची ,ममुआं के मुठान पर है । देख हो नञ्, नकिया उनखरे ऐसन उठल हइ !" बड़की फुआ डांट के बोललन- "भक् ! भकचोंधरी, सूझऽ हौ तोरा कुछ ? मैये से मिल है ।" लइका के रंग के बारे में भी, जेतना मुंह ओतना बात । कोय कहे गोर होतै, कोय कहे करिया । कुछ-कुछ धमसनमा छौंड़ा नियर होतै । अंत में सब कोय ई बात पर आ टिकलन कि लइका नञ् माय नियर करिया होतै, नञ् बाप नियर गोर, सांवर होतै । रहल नञ् गेलन तो पछियारी नानी मूड़ी हिलैते अप्पन कोठरी से निकसिये अयलन आउर ‘सबके निपल गेलो दहाय, अब के निपल देख गे दाय’ कहावत सिद्ध करेले बोललन - "तोहनी सबकि जाने गेला ? बुतरू कैक रंग बदले हे । अभी और कुछ नञ् कहल जा सकै हे । मुदा होतै गोरे ।" "कैसनो होवै,हमरे ऐसन दांत टूटै, बचै, एक से एक्किस होवै ।" तब लइका के दादी बोल उठलन - "हंऽ  माय, बड़ गंगा गजाधर नेवलूं तब भगवान पोता के मुंह देखौलन हे । सब मिल आसीस देहू । कैसनो होवै, ‘घी के लड़ुआ टेढो भला’ ।" सोहनी चाची बराबर खोरनी लेले रहऽ  हलन आउर जरंत एक नम्मर के । बुतरू देख के नाक भौं सिकोड़ के आउर मुंह बिचका के बोललन - "ऐसे जे कह सब, मुदा हमरा मुंह देखली नै बोले आवे हे । बुतरू सतमासु लगऽ हे । काहे कि कनैया के भर पेट खाइयो नै मिलऽ हलै । आउर छौड़ा तो कार अलकतरे होतै ।" सोहनी के बात पर कोहार मच गेल । उकटा पुरान के बाजार गरम हो गेल । दलान पर से भुनेसर आउर गांव के दस पांच आदमी जुट गेलन तब रोक थाम हो गेल । सोहनी चाची धसक गेली । रजमतिया फुआ बोलली - ‘एक छौड़ी आ गेल लुतरी लगा गेल, अपने परा गेल’, ईहे बात हो गेल आउ की !
            कि झुमइत-झुमइत आ पहुंचल रमरतिया, मुनिया, धनिया आउर चुनियां, लचकयत-मचकइत आउर जवानी के जोस में उमहल हुरदंग मचइते । ई सब में मेठ हल, बोले में तेज और नटखट, रमरतिया । बरस पड़ल- "काकी , दादी, नानी, सब हटऽ यहां से; ठीके कहल गेल हऽ कि जहां बुढ़ियन के संग, तहां खरची के तंग, आउर जहां लइकन के संग, तहां बाजे मिरदंग’ । सब सठिया गेलन हे । ओकर सिकायत ओकरा से, आउर ओलहन खटपट । भुनेसर भइया के बेटा भेलैन हे । ई खुसियाली में गीत-गौनी होवे के चाही । ई गियान-धियान केकरो नञ।" आउर उठल सोहर--                                                     'अंगना जे लिपलो दहावही आउरे, पहापही हे, ललक देखली नैहरवा के बाट, भइया मोर आवथी हे ।' गीत समापत होल कि चुहल आउर धमाचौकरी मचे लगल आउर हा....हा....ही....ही....हु...हु....हु  होवे लगल आउर घंटो चलल । फिर पान खा-खा के सब अपन घर के रास्ता लेलन ।
            दुख के दिन पहाड़ आउर सुख के दिन हवा हो जाहे । गीत-नाध में भेार से रात आउर रात से भिनसरवा होते-होते छौ दिन हो गेल आउर आज छठियार हे । दाय के हंकार पड़ल -- अंगना, ओसारा आउर दलान लीपे ला; नफर के पुकार भेल गंगाल में पानी भरे ला; आउर नाउन  के बुलाहट भेल नोह टूंगे ला । अप्पन अप्पन काम में सब जुट गेलन ।
           नाउन परसौती मालकिन के नोह टूंगते-टूंगते अप्पन आमदनी के ब्योंत लगावे लगल, काहे कि ‘आदमी में नउया आउर पंछी में कउआ’ बड़ बुधगर होवे हे । "तऽ बहूजी ! जल्दी से बताहु नञ् कि छठियार के नेउता कहां- कहां जइतै । हम्मर मरदनमा के कि जानी छुट्टी हइ कि नञ् हे ।
बतावल रहतै तो, नञ् होतै, हम्हीं दे ऐतियइ हल ।"
"तू बउड़ाही हें कि गे ! कहां-कहां नेउता जिइतै ई भी पूछे के बात हे ?"
"तइयो बहूजी, बताइये देतहो हल तो बेस बात हलै ।"
"तो सुन,........नेउता बस तीने जगह........कहां-कहां ?"
"हम्मर नैहर एक; सुनला ?"
"हं मलकिनी, हुआँ तो जरूरे जाय के चाही ।"
"दू, उनखर ससुरार; सुनला ?"
" अ हं,सुनलिये न तब !"
"तीसर जगह बबुआ के ननिहाल । याद कइलें ?" "हां मलकिनी, समझ गेलियै, नेउतवा तीने जगह जइतै ।"
बहू बुदबुदैलन-- "दुनियां-जहान से हमरा कौन मतलब हे !" कि कोना में बैठल भुनेसर के माय फट पड़लन- "देख तो निगोड़ी के ! खाली अप्पन नैहरे तलक । हम्मर बेटी-दमाद के नेउता हम्मर पोता के छठियार में नञ् जात, ई हमरा से बरदास नञ् हो सके हे । बाप रे बाप ! ई कैसन कुलच्छनी हम्मर घर में ढुक गेल कि हम्मर कुल परिवार के पराया समझे हे !!"
कि दाल भात में उंट के ठेहुन बन के सोहनी चाची आ बिराजलन आउर ‘पूछ नञ् पाछ, हम दुलहिन के चाची’ बनके बोल उठलन--
"ठीके तो कहऽ हथिन भुनेसर के माय ! बाप रे बाप ! करकस्सा होवऽ हे तो ऐसन कुलपरिवार आउ अप्पन नाता-गोता के जे कलमुंही नञ् चिन्हे, ओकरा तो घर से निकास देवे के चाही ।" बस, धधकल आग में घी पड़ गेल । लियो-लियो बोल देवे पर कुतबो लड़े लगऽ हे, आदमी के कौन ठिकाना ! सास-पुतोह कमर कस के मैदान में आ गेलन, एक दूसर के बखिया उघाड़े लगलन । भाय-बाप-भतिजा के सराध होवे लगल, दुन्नो के कुल में कालिख पोताय लगल। गाली-गलौज के नाली के सड़ांघ से भला आदमी के नाक फटे लगल । हल्ला सुनके भुनेसर आ जुमलन । माय के मुंह से निकलल गारी ओकर काने से टकरा गेन । उ समझलक कि सब कसूर माय के हे । मौका देख के भुनेसर के बहू बिलाप करके छाती पीटे लगल । भुनेसर ‘नञ् आव देखलक नञ् ताब’, उठौलक डंटा आउ माय के पीठ पर तड़ा-तड़  बजावे लगल । कैसे तो भुनेसर के लंगोटिया यार लोहा सिंह पहुंच गेल आउ डंटा छिन के छप्पर पर फेंक देलक आउ डांट-फटकार के ओकरा बाहर लैलक, नञ् तो बुढिया उहंइं ढेर हो जइतै हल । भुनेसर के बहू कोठरी में जाके दुबक गेल आउर उहंइं सुबकते रहल ।
        करे के तो करिये गुजरल, मुदा भुनेसर के ई बात के बड़ी कचोट हे । गुस्सा बड़ी चंडाल होवे हे । बाद में जब ओकरा मालूम होल कि कसूर खाली माये के नञ् हे आउर गारी देवे में दुन्नो पलड़ा बराबर हल, तो ओकरा एक साथ हजार बिच्छा डंक मारे लगल ।
        भुनेसर के माय दरद-पीरा से कानते-रोते आउ ई कहते रामलखन बाबू के इहां जा रहल हे कि - "हाय ! भुनेसरा के ओढनी के बयार लग गेल ! हम ई जनतियो हल रे छौंड़ा, कि तूं हम्मर ई हाल करमे तो सउरिये में नून चटा देतियौ हल। निपुतरी रहतुं से अच्छा । निगोड़ी नीमक पढ़ के खिला देलक हे भुनेसर के, तबे न उ ऐसन बेदरदा निकसल ! मरदाना मर गेला तो हम केतना दुख उठा के आउर केतना जतन से ओकरा पाललूं-पोसलूं आउ खेत गिरमी रख के बिआहो कर देलूं । ऊ हम्मर नञ् होल।"
    रामलखन बाबू भुनेसर के गोतिया हथिन । सौ सवा सौ चास-वास हन । बाग हन, बगिचा हन । गांव के मुखिया ओही चुना हथ । समाजवादी देस भारत में अबहियो पद-परतिस्ठा अमिरे के मिलऽ हे । गरीबो के कहियो नसीब होत ई, तो भवानी जानथिन !
     बुढिया जा पहुंचल ड्योढी पर । रामलखन बाबू चौकी पर बैठल हलन । देख के बुढिया लोर ढारे लगल आउर अचरा से लोर पोछ के बोललक- "देखऽ बडका बाबू, निगेाड़ा भुनेसरा मेहरी के कहना में हमरा बड़ी मार मारको हे, दरद से हम बेहाल हो रहलियो हे । तोहर दरबार में केस करऽ हियो । ओकरा ऐसन सजाय दऽ कि ओकरा छठी के दूध इयाद आ जाय । हाय राम ! छछात कलजुग कि भठयुग आ गेन बड़का बाबू !"
     "आयं ! भुनेसर मारको हे तोहरा ? देखियो कने मारको हे । बुढिया पीठ उधार के देखा देलक । बाप रे बाप ! दाग उखड़ल हो । ई अनियाय ! ई जुलुम ! भुनेसरा तो खानदानके नाम डुबा देलक । आउर ऐकरा में जिला-जेवार के भी नामहंसी हे । हम ई जुलुम नै बरदास कर सकऽ ही । हम भुनेसरा के आझे जात से खरिज करऽ ही । आझ से हुक्का-तम्बाकु बंद।"
      "आयं ! की बोलला बड़का बाबू ? जात से खारिज ? हुक्का-तम्बाकू बन्द वाह रे! कौन बेटा जनमल हे हम्मर बेटा के हुक्का-तम्बाकू बन्द करे वाला कि ओकरा मुंह में कारिख लगल हे ?  जे कोय मोछकबरा भुनेसरा के हुक्का तमाकू बन्द कर देत ? एतने बात हे कि हमरा दू डंटा मार बैठल । हमरा बेटा हे, तब ने मारलक ! जे निगाड़ा- निगोड़ी के ‘न आगे नाथ न पाछे पगहा है’, ओकरा के मारतै ? ले देखऽ इन्साफ । रहे दा अप्पन इन्साफ ! बेटबा हमरे, पुतोहियो हमरे । रखऽ अप्पन नियाव, हम अप्पन घर जाही ।"
       रामलखन बाबू हक्का-बक्का । ड्याढी के कोना में खड़ा भुनेसर आउ भुनेसरबहू सब सुन रहल हल । घर जाके माय के हरदी-चूना भुनेसर लगावे लगल आउ बहू गोड़ में कङुआतेल लगवे लगल ।
------------------------------------------------------------------------------------------
दीनबन्धु के तीन गजल.........
    1.
अयाती के पियास लेले, फिर रहल हऽ अदमी ।
अपने अप्पन जाल में, धिर रहल हऽ  अदमी ।
चढ़े के सनक में,  चढ़ गेल भी  अनचढ़ पर,
थिर से नञ् थाह लगल, तऽ गिर रहल हऽ अदमी ।
मुहं से बात सान्ति,  समझउता के  झण्डा लेले,
जहां देखऽ भउठले,   भिड़ रहल  हऽ अदमी ।
गउतम गांधी के बात  अउ हावा में उड़ गेलो,
चारवाक हांक पर, अउथिर  रहल हऽ अदमी ।
आस  के बास नञ्, ने  करम बीआ बूने,
अदमियत के अंचरा, हे तीर रहल हऽ अदमी ।
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------
2.
दिनो दिन जहर सउ पचल जाहे ।
जेतना विख हमरा ले रचल जाहे ।।
सांति सांति के खाली हल्ला से,
बड़ी कोहराम  अउ मंचल जाहे ।
बाघ के हांथ अहिंसाऽ झण्डा,
मांद में हाड़ अउ ठंचल जाहे ।
टीक में बांध देलक हऽ डोरी,
ओकरे अंगुरी से सउ नंचल जाहे ।
हंस के मांस बिक रहल देखऽ,
कउयन के फैसला, जंचल जाहे ।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
3.
उनखर मींठ बोल अउ ताली हे ।
नीचे से उपरे तलुक जाली हे ।।
रतिये सपना में खूब खिलइलका,
भोरे देखलूं तउ पेट खाली हे ।
हमर कटोरा अब बनल चलनी,
उनखा लेल सोना के थाली हे ।
छोट-छोट कली छेद के बिकल,
बेचेवला कोय नञ् माली हे ।
उनखर रसता बाढूं पीपनी से,
हम्मर रसता  में  भूजाली हे ।
----------------------------------------------------------------------------------------
                   हे भू जननी
                           कारूगोप
हे भू जननी, मंगल  करनी  निर-क्षिर, समीर  प्रदायनी,
जन-गन- चन्दन  तिलक  रज-कन-समुन  पीके पानी।
ताज हिम-सित परम सुहावन, चरन पखारे जल धारिनी,
मलय-गिरि पवन सुगन्ध दानकर जन-मन के करि पावनी ।
प्रथमअ  सभ्य-गोद, वेद उचारे  मंत्र   महामुनि ज्ञानी,
बैर  अंध-विश्वास  सकल  तज चरन तोहर   लपटानी ।
हरित,  श्वेत बल  चक्र केसरिया  उड़ल तिरंगा निवासी,
चेतन हम, जड़ तों गुनरवानी निज गुन सकई न बरवानी ।
प्रतिनिधि  बन गुन गाबूं जननी,  ध्यान धरई  सब ज्ञानी,
जखनई विधिन-छन अईतई जननी, भरत-पूत बलिदानी ।

*वैद्यमुनि कारू गोप के निधन से मगही साहित कें बड़गर नुकसान हो गेल हऽ, जेकर भरपाई न करल जा सके हे । मगही मनभावन परिवार उनका सरधा के फूल अरपित कर रहल हे ।*
------------------------------------------------------------------------------------------
जयराम सिंह के दू गीत
बदरिया गावऽ है कजरिया
बदरिया गावऽ हे कजरिया, झूम गगन के अंगना,
गगन के अंगना हो गगन के अंगना ।
रात के समैया में, गगन के तलैया में,
खिलल फूल तरेंगन के रंग-विरंग ना,
इंजोरिया खेने अंखमिचौनिया राम, बदरिया संग ना ।
बदरिया गावऽ है कजरिया, झूम गगन के अंगना ।।
रात गेल भेल भोर, लाल होल पूरब ओर,
इन्द्रधनुष उगल जैसे टंगल टंगना ।
उगल जे सुरूज लगै, उषा के कनक के कंगना ।
बदरिया गावऽ है कजरिया, झुम गगन के अंगना ।।
पड़ै बूंद, नन्हिया रे, कानै विरहिनियां रे,
हवा बहे जैसे कोय, डुलावे विजना हो राम, डुलावे विजना ।
ई बदरा कार भेल छीन के नयन के अंजना ।।
बदरिया गावऽ है कजरिया ,झूम गगन के अंगना ।।
   तोहरा देखऽ ही सपनमा में...
रोज-रोज आवऽ हखो भोर के सपनमां में,
दिनों भर दिलवा में रात के नयनवां में,
भीतरी अंखिया देखो तोहरा दिल दरपनमा में गोरे-गोरे ।
तेहरा देखऽ ही सपनमा में भोरे भोरे।।
जेरल अगिया खरकल तोहर आवै के संदेसा मिलल,
भाता खाते पनियां सरकल जीया में अंदेसा जगल,
तेहरा बिनु सूझे नञ कुछ, छोह के कुहेसा लगल ओरे-छोरे ।
तोहरा देखऽ ही सपनमा में भोरे भोरे।
वहां गेला पर विसरला हमरा औ आवै के बतिया,
आवै तो तूं कि जब हमरा देला नञ  एको भी पंतिया,
तोहरे बिनु आठो पहर उठऽ है देहा दरदिया पोरे-पोरे ।
तोहरा देखऽ ही सपनमा में भोरे भोरे।।

तोहरा हमरे किरिया हो ऐसों अइहा जरूर होलिया में,
आवै के सगुनमां पाउं रोज कउआ के बोलिया में,
´नञ  ऐभो तो सभे संका करथुन तोहर चलिया में थोरे-थोरे ।
तोहरा देखऽही सपनमा में भोरे भोरे।।
भोरउआ सपनमां की तो कबहूं नहीं झूठ होवै,
जैसे अक्षयवट के पेंड़ा कबहुं नहीं ठूंठ होवै,
देवी अरदसिया जे कबहूं नहीं फूट बीच मोरे-तोरे ।
तोहरा देखऽ ही सपनमा में भोरे भोरे।।                  
----------------------------------------------------------------------------------------                                       
       हर हस्ती हमर हिमालय हइ        
                           मथुरा प्रसाद नवीन
दुस्मन कोय आंख देखइतइ नञ, सीमा मों हमर समइतइ नञ,
ई सस्यस्यामला धरती के अंचरा में दाग लगइ नञ् ।
हइ गरब ग्यान के गीता से,
जे गाल बजइतइ मरसि लेबइ;
जे ताव चढ़इतइ तेउरी पर,
तरवारि से तरवा तरसि लेबइ;
हक आउ हकीकत रोटी पर कोय जुल्मी दांत गड़इतइ नञ् ।
अब दिन बितलइ बतियावइ के,
हम सजग ही, समा समरि जइतइ;
जब खींच लेबइ हम ताकत से,
असमान के देह नमरि जइतइ;
जब संख फूकइतइ पांचजन्य, दुर्योधन बिगुल बजइतइ नञ् ।
हम सिवा छत्रपति सन सुरियल,
भाला प्रताप के नोंक नियर;
हम ही कराल, कदराहा नञ्,
तूफान हवा के झोंक नियर;
हम जन्ने फिरइबइ आंखि अपन, कोय अप्पन आंख नचइतइ नञ् ।
तांडव हम्मर भउं पर थिरकल,
तिरसूल हाथ में धइले ही,
सिव सन समाधि ले सीमा पर,
बाघम्बर अपन बिछइले ही,
हर हस्ती हमर हिमालय हइ, कोय हमरा से टकरइतइ नञ् ।
ई सस्य-सयामला धरती के अंचरा में दाग नगइतइ नञ् ।
------------------------------------------------------------------------------------------
 कहानी                                                                                       
              मनाही
                                      डॉ0 किरण कुमारी शर्मा
                 गया-जमालपुर फास्ट पसिंजर के एगो साधारण डिब्बा । डिब्बा की हल, संउसे बिहार के छोटगर संस्करण । जादेतर छोटगर लोग, कुछेक बड़कन भी । पेन्हावा-ओढ़ावा से ले के बोल-चाल, हाव-भाव में भी भिन्नता । एपीएल बीपीएल वला भिन्नता नञ्, सचकोलवा भिन्नता । चनाचोर गरम एझूङी भाजा ...एगो महीन अवाज सुन के हम्मर दिमाग खनकल, धेयान टूटल । देखलूं- एगो आठ-दस बच्छर के बुतरू झूड़ी भाजा बेच रहल हे । सामने वाला सीट पर तथाकथित सभ्रांत औरत अप्पन बेटा साथे बइठल हल । औरत खिड़की से बाहर के नजारा देखे के बहाने अंदर के माहौल से कटे के नाटक कर रहल हल, हालांकि ओकर बेटा के आंख में झूड़ी भाजा के गोल-गोल घिरनी नाचना शुरू कर देलक हल । कहलक-- मम्मी-मम्मी ई का हे ?
- का........?
- ओही जे राउन्ड- राउन्ड हे ।
-  ऊ गंदा चीज हे,तोरा खाय लायक नञ् हे । देखइत न हें .........।
- डाक्टर अंकल मना कइलन हे ।
लड़का माय के तेवर देख के चुप हो गेल ।
- माय हम ऊहे लेवइ । सुनके ओने ताकलूं । एगो माय, जेकरा घंघेटले चार-पांच गो लेरू-पठरू नियर पांच से बारह बरिस के बुतरूअन के धुंधरू ।
- अभिये न देलिअउ हल बिसकुटवा । दलिद्दर कहीं के जतना चीज बिक्के अइतो, सभे कुछ मांगतो । बप्पा धोंधवर देके चलइलकउ हल । चुपचाप बइठ, नञ् तो मारबउ ने अइसन धसोड़ कि...........।
कहके मइया सबसे फलिस्तवा के अंचरा तर ले के दूध पिलावे लगल । बड़का सक्क दम्म । मंझला के आंख में ओइसन गोल-गोल घिरनी । संझला सीट के नीचु लोट चुकल हल । बाकि बेचेवला के आंख में ओइसन बोल-गोल घिरनी नञ् हल । ऊ एक-एक बुतरू पर नजर गड़इले हल- झूड़ी भजवबा बोलल - बउआ के मनमा डोलऽ हइ । कह के ऊ जइसे आग में घी दे रहल हल, बाल हठ के पोबार में तितकी लगा रहल हल । हम बेचेवाला के अपना पास बोला के पूछलूं-
- कि नाम हउ?
- छोटुआ ।
-कतना उमर हउ ?
-पता  नञ्....?
-तोरा ई झूड़ी भजबा खाय के मन नञ् करऽ हउ ?
-ई केकरा खाय के मन नञ्  करतइ ? बाकि खा जइबइ तउ चुल्हवा कइसे लहकतइ ? मइया की खइतइ ? बाउ की पितई ? दादा के दवाय, दीदी के विआह, छान-छप्पर कइसे होतइ, ई सब ?
हमरा मुंह में बकारे नञ । ऊ झूड़ी भाजा एकदम ताजा, कहते आगु जा चुकल हल ।
------------------------------------------------------------------------------------------
पुस्तक-समीक्षा

आखिर कहिया तक
*कवि मथुरा प्रसाद नवीन के काव्य सेंगरन* 
संपादक - डॉ0 भरत सिंह
प्रकासक - जागृति साहित्य, प्रकाशन पटना -6
समीक्षक - डॉ0 शिवेन्द्र नारायण सिंह
मूल्य -250 संस्करण - 2011

           झकल कवि लोगन में दू तरह के विचार सकिरीए हे । पहिला ई कि कवित्व भी आज दोसर कला नियर सिरफ एक कला हे । ऊ शाश्वत  होवे हे । ईले ओकरा समाज के तात्कालिक प्रसंग से  जोड़ना मुनासिब नञ् हे । दोसर विचार के मत हे कि कविता समाज के संदर्भ से जुटके ही सार्थक हो सकऽ हे । अइसन कविता जेकरा में अप्पन समाज के लोगन के अकांक्षा के अभिव्यक्ति नञ् रहे, ऊ जन विरोधी होवेऽ हे । ई तरह के कवि विचारधारा के महत्वपूर्ण मानऽ हथ । अइसने कवि हला मथुरा प्रसाद नवीन । उनखर हर कविता व गीत में जन सरोकार से जुड़ल मुद्दा दिखाइ पड़ऽ हे । इनखर कविता में अक्खड़पन, निर्भिकता, जुझारूपन, क्षोभ, कटाक्ष, व्यंग्य, निर्द्वन्दिता, पक्षधरता आदि के पुट मिलऽ हे । इनखर सिरजन में        रस,अलंकार, रीति,गुण, दोष ,ध्वनि सभे किसिम के काव्यशास्त्रीयरूप मौजूद हे ।
         समीक्ष्य पुस्तक में कवि नवीन जी कुल 81 मुक्तक  कविता संकलित हे । नवीन जी के ई सेंगरन प्रघट्टक हे । ई परे सेंगरन में जहां एक ओर जातियता, सांप्रदायिकता, शोषण, झूठकोलवा, कर्मकांड, पूजा-पाठ, तड़क-भड़क, उत्सवर्ध्मिता, राजनीतिक अवसरवादिता, साहित्यिक पद लोलुपता  शैक्षणिक अराजकता,भ्रष्टाचार पर चोट कैल गेल हे, वहीं दोसर ओर जन संस्कृति, देश के दशा, समाज, घरम, परिवार व्यवस्था आदि पर भी ढ़ेर रोशनी डालल गेल हे।
        सफेद पोश तिनका हो, ई सदी के भारत, समय के तकाजा, दुर्योधन के देस आदि में देस के धनिक के चरित्र आझ किरिया कलाप, आर्थिक विसमता व गैरबराबरी के सजीव चित्रण कैल गेल हे । एकरा से मुक्ति के प्रेरणा देल गेल हे । आजादी सौ कोस, आउ आजादी, आजादी के बाद, स्वतंत्रता सेनानी, जइसन कविता आउ हिंदुस्तान हमर में लोकतंत्री भारत मइया के एकरूपता के यथार्थ चित्र देखावल गेल हे ।
       ई सेंगरन के  शीर्षक बड़ी उपयुक्त हे । नवीन जी व्यवस्था परिवर्तन के प्रबल झंडावदार हलन । उनखर हर कोसीस रह हल कि हम्मर देस में आर्थिक आउ सामाजिक समानता आवे, समरस समाज बने, शोषण आउ भ्रष्टाचार के समूल नाश होवे । मुदा ई  होत कब तक ? संपादक ई सेंगरन के ई नाम दे के सचमुच में कवि नवीन जी के हार्दिक संवेदना के व्यक्त कइलन हे ।
        वास्तव में ई किताब जनोपयोगी, प्रेरणादायक, नव निर्माण के संदेसवाहक हे । एक्के साथ मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी, राजनेता, औरत-मरद, बूढ़ा-बुतरू सब ले पठनीय हे । किताब के संपादन के गड़बड़ी कम जगह नजर आवे हे । संपादक जी जे अप्पन बात लिखलका हऽ ओकरा में पृष्ठांकन नञ् हे । एकरा से ओकर उद्धरन देवे में शोधकर्त्ता के आउ आलोचक के खूब दिक्कत होत । एकरे में संपादक जी कुछ अइसन शब्द के प्रयोग कइलन हे जे गांव में रहे वाला कम पढ़ल लिखल लोग के समझे में कठिनाई होत । एकरा साथ-साथ एक बात आउ हे । ई किताब के दाम अधिक हे । नवीन जी के रचना के मुख्य केन्द्र बिन्दु गरीब मजदूर-किसान हथ । ई ओतना पैसा लगा के एकरा पढ़ पइता जरी मुश्किल बुझा हे । हम्मर ई चाहत हे कि एकरा पेपर बैक में भी प्रकाशित कइल जाय, जेकरा से कि नवीन जी के रचना के वास्तविक केन्द्र बिन्दु लाभान्वित हो सकथिन । एकरा से स्वर्ग में विचरइत नवीन जी के आत्मा के भी सांति आउ सकुन मिलत ।
------------------------------------------------------------------------------------------
मगध विश्विधालय स्नातकोत्तर मगही विभाग के प्रथम स्थापना दिवस समारोह
                                        पर एगो रिर्पोट
           10 सितमबर 2011 के मगध विश्विधालय स्नातकोत्तर मगही विभाग के प्रथम स्थपना दिवस मनावल गेल । समारोह अपने आप में खाली स्थापना दिवस नञ्, बलूक मगही साहित के उपलब्धि के एगो महान ऐतिहासिक दिवस हल, जेकरा में मगही विभाग के खाली शिक्षके, छात्र आउ कर्मी नञ् जुटनथिन, बलूक मगध समेत बिहार आउ झारखंड के मगही के झमटगर-झमटगर साहितकार जुटलथिन । मगही विभाग के अप्पन साल भर के काम-काज के लेखा-जोखा के साथे-साथ मगही साहित पर  साल भर में जे काम होलय, ओकरा देख के आज मगही साहितकार नितरा रहलथिन हऽ । मगही के हर विधा पर जमके काम होलय । एकर गोवाह ई समारोह में लोकार्पित कैल गेल दरजन भर किताब हे । मगही विभागाध्यक्ष डॉ0 भरत, उनखर पीठ पुरावे वाला साहितकार मिथिलेश आउ उनखर सहयोगी के सगरो बड़ाय आउ साधुवाद मिल रहले हऽ आउ मान रहले  हऽ कि मगही अब अप्पन मंजिल से दूर नञ् हे ।
काजकरम ई रूप में भेल
           काजकरम के उद्धाटन मगही अकादमी के अध्यक्ष उदय शंकर शर्मा, अतिथि मनमोहन पाठक, शेषानन्द मधुकर, डॉ0 राम प्रसाद सिंह, डॉ0 राजदेव शर्मा , गोवर्धन प्रसाद सदय सब मिल के कइलन । अध्यक्षता राम नारायण सिंह आउ मंच संचालन डॉ0 भरत सिंह कइलन । उद्घाटन के बाद चन्द्रावति चन्दन के सरस्वती वन्दना से काजकरम के शुरूआत होल । फूल माला आउ बुके देके अतिथि के स्वागत करल गेल ।                     
दरजन भर किताब के लोकार्पण
                              काजकरम में दरजन भर किताब के लोकार्पण होल । मिथिलेश के कहानी संकलन कनकन सोरा, डॉ0 भरत सिंह के माटी के महक, उनके संपादन में आखिर कहिया तक कवि मथुरा प्रसाद नवीन के कविना सेंगरन, डॉ0 भरत आउ डॉ0 चंचलाकुमारी के संपादन में मगही जतरा, अजय के कविता सेंगरन सकरी के करगी, नागेन्द्र बन्धु के दूगो नाटक वनदेवी आउ असली चेहरा, कृष्ण कुमार भट्टा के दूगो नाटक दुलहिन बड़ कि दहेज आउ एक राह आउ के लोकार्पण भेल । स्थापना दिवस के मौका पर स्मारिका मगही सुजाता के लोकार्पण काजकरम  में चार चांद लगा देलक । किताब स्तरीय गेटअप- मेकअप में देस के प्रतिष्ठित प्रकाशन कला प्रकाशन वाराणसी, विशाल पब्लिकेशन पटना, जागृति प्रकाशन पटना आउ स्वयं सेवी संस्था के मदद से छपावल गेल हऽ ।
सम्बोधन आउ कवि सम्मेलन
                         उद्नघाटन, लोकार्पण के बाद सम्बोधन के दौर चलल, जेकरा में पहुंचल सभे जिला के गणमान साहितकार आउ मगही के प्रोफेसर, शिक्षक के बोले के मौका मिलल । मुख्य वक्ता के रूप में म0 वि0 के डी एस डब्लू बी बी शर्मा,  हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 वंशीधर लाल, धनवाद के बी बी शर्मा  एमनमोहन पाठक, हजारीबाग के षेषानन्द मधुकर, डॉ0 राम प्रसाद सिंह, डॉ0 राजदेव शर्मा, गोवर्धन प्रसाद सदय, राम रतन सिंह रत्नाकर, ए शर्मा, जयनाथ कवि, उमा शंकर सिंह सुमन, पटना के घमंडी राम, दिलीप कुमार, सीमा रानी, जहानाबाद के महेन्द्र प्रसाद देहाती, सुधाकर राजेन्द्र, मगही पत्रिका के संपादक धनंजय श्रोत्रीय, टोला-टाटी के संपादक सुमंत, अरविंद कुमार ओजांस, शम्भू विश्वकर्मा , अक्षुत भानु, मगही अकादमी अध्यक्ष उदय शंकर शर्मा  समेत कय दरजन अतिथि संबोधित करनथिन । धन्यवाद ज्ञापन डॉ0 किरण शर्मा कइलथिन ।
कवि सम्मेलन में दीनबन्धु, परमेशरी, चन्द्रावती चन्दन, नरेन्द्र सिंह अशोक समदर्शी, सागर आनन्द, अमरदेव सिंह अमर, वासुदेव प्रसाद, मुन्द्रिका सिंह, सुधाकर राजेन्द्र, घमंडी राम, चतुरानन्द मिश्र, रामविनय षर्मा, गोपाल निर्दोष, जयनन्दन आउ कय दरजन कवि मगहिया धार देखैलथिन ।
मिलल ताकत, होल संकलप
            काजकरम मगही साहित के बड़गर ऐतिहासिक दिन हल, जेकरा से सभे साहितकार के मगही में काम करे के ताकत भेंटल आउ प्रेरणा जगल । मगही भासा के लगभग सभे विधा में स्तरीय रचना लिखे के आहृवाहन के साथ मगही के सम्मान ले एकजुट होवे के निहोरा कइल गेल । जनप्रतिनिधि के जहां धिक्कारल गेल, ओहैं जन जन के आन्दोलन चला के मगही के मोकाम तक पहुंचावे के संकलप लेल गेल ।
------------------------------------------------------------------------------------------

पत्रिका से जुड़ल जरूरी बात

रचना मगही साहित के प्रचार-प्रसार के लेल इहाँ रखल गेल हऽ। कौनो आपत्ति होवे पर हटा देल जात।

निहोरा

मगहिया भाय-बहिन से निहोरा हइ कि मगही साहित के समृद्ध करे ले कलम उठाथिन आउ मगही के अप्पन मुकाम हासिल करे में जी-जान से सहजोग करथिन।

* मगही मनभावन पर सनेस आउ प्रतिक्रिया भेजे घड़ी अपन ई-मेल पता जरूर लिखल जाय, ताकि ओकर जबाब भेजे में कोय असुविधा नञ् होवै।

* मगही मनभावन ले रचना ई-मेल से इया फैक्स से चाहे हिन्दी मगही साहित्यिक मंच शब्द साधक के कारजालय, हिसुआ पहुँचावल जा सकऽ हे।

शब्द साधक
हिन्दी मगही साहित्यिक मंच
हिसुआ, नवादा (बिहार)
shabdsadhak@gmail.com

                                                                  
http:magahimanbhavan.blogspot.com

magahimanbhavan गूगल पर लिख के Enter दबावऽ, आउ मगही मनभावन पढ़ऽ
**************

2 टिप्‍पणियां:

  1. maghi manbhavan ego sahsik aur yugantkari prayas he.ham ekar tah-e-dil se swagat kara hi.bhai uday badhai ke patra hath je jan bhawna ke kheyal kar ke etna badgar karj kailan he,unka alag se sadhuwad.sri jairam,karu babu aur dinbandhu ji jaisan sashakta hastakshar ke ek sath dewe khatir v dhanyawad.agil ank ke besabri se pratiksha me----Rajesh Manjhwekar

    उत्तर देंहटाएं
  2. मगही साहित्य ई-पत्रिका मगही मनभावन के पहिला अंक इंटरनेट पर पढली,जीउ जुड़ा गेल ।इंटरनेट के जमाना में ई जरूरी हल। भाई उदय भारती जी तोहरा साथे पथिक जी के बहुत-बहुत बधाई!
    सुमंत,टोला-टाटी,गयाजीमगही साहित्य ई-पत्रिका मगही मनभावन के पहिला अंक इंटरनेट पर पढली,जीउ जुड़ा गेल ।इंटरनेट के जमाना में ई जरूरी हल। भाई उदय भारती जी तोहरा साथे पथिक जी के बहुत-बहुत बधाई!
    सुमंत,टोला-टाटी,गयाजी

    उत्तर देंहटाएं