शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

मगही साहित्य ई-पत्रिका अंक-२



मगही साहित्य ई-पत्रिका अंक-२

मगही मनभावन

मगही साहित्य ई-पत्रिका

अंक - २        माह- अक्टूबर २०११

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ई अंक में.......

दू गो बात

किस्सा-कहानी

उपास---- रवीन्द्र कुमार
बिआह-बिआह---- दीनबन्धु

कविता-कियारी

दशरथ बाबा के नामे,
निमकहराम----अरूण हरलीवाल
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?--- योगेश्वर प्रसाद सिंह 'योगेश'

गीत

 गीत----जयराम देवसपुरी

ग़ज़ल

श्रीकान्त शास्त्री
मृत्युंजय मिश्र 'करुणेश'

पुस्तक-समीक्षा

पंछहरी---- डॉ० राधानन्द सिंह

रपट, लोकार्पण

मगह के दूगो काजकरम

सनेस मिलल

ई नारायण प्रसाद, सुमंत, राजेश मंझवेकर के सनेस

निहोरा
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 दू गो बात.........

        मगही मनभावन के दोसर अंक लेके अपने  के बीच हाजिर हियै। एकर पहिल अंक के अपने  बड़ी 
उत्साह से सोवागत कैलथिन, जेकरा से हमरा भरपूर तागत मिलल। हम अपने के सनेस के हिरदा से लगावऽ ही आउ आगू भी सुझाव के आसा रखऽ ही।
          ई अंक में रखल गेल रचना पर हम कुछो नञ् कहबै। एकरा पर अपने लोग बिचार देथिन। ऐसन ढेरे रचना से हम्मर मगही साहित भरल पड़ल हे। सबद के शिल्पी मगही के तराशे में पहिले भी लगल हलथिन आउ अभियो तराशिये रहलथिन ह। उनखर लेखनी के सनेस समाज तलुक पहुँचावे के काम हमनी के हे, मगही के स्तरीय साहित के जौर करे के जरूरत हे।
         हम अभारी हियै आदरजोग ई० नारायण प्रसाद, दीनबन्धु, मिथिलेश, डॉ० भरत, रामरतन सिंह रत्नाकर, सुमंत, डॉ० संजय, राजेश मंझवेकर के, जे हमर उत्साह बढैलथिन। ई० नारायण प्रसाद के पहिल बधाई से हमरा खूमे बल मिलल। उनखर जैसन साहित साधक के हाथ हम्मर माथा पर आल, ई हमरा ले सौभाग्य के बात हे। ऊ अन्तरराष्ट्रीय मंच पर कते भासा के सेव रहला ह। हम उनखर साधना के नमन करऽ हियै।
         मगही पत्रिका के निकासे में धनंजय श्रोत्रिय पर जे धून सवार हे, ओहे धून आउ क्रान्ति के जरूरत मगही साहित में हे। श्रोत्रिय जी के काम से प्रेरणा लेवे के चाही।
        हमर मगही के भविष्य उज्जवल हे, एकरा में कउनो शक के गुंजाइश नञ् हे। एकरा पर साहित आउ संस्कृति के ऐसन अमरित छिटल हय कि ई दूभी कहियो नञ् मुरझात। सगरो ई धरती पर सदा लहलहैवे करत।
          आउ आखिर में ई अंक में छपल गलती-सलती ले माफी।

                                                                                   उदय कुमार भारती

                                                                              kavi.udaybharti@gmail.com
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कहानी

                                       उपास 
                                                      रवीन्द्र कुमार 
  .......मुनचुन जी ई युग के आदमी नञ् हथ.........मुनचुन जी बनऽ हथ---मुनचुन जी........।
      जेत्ते मुँह, ओत्ते बात। मुनचुन जी केकरा की कहता ? केकर-केकर मुँह पकड़ले चलता। साठ बरीस उमिर पार कर चुकलन हे। सरीरो धीरे-धीरे जबाब देबे लगल हे।
      मुनचुन जी सोंचऽ हथ-- हँऽ, ई बात ठीक हे कि ई जुग के अदमी ऊ नञ् हथ। ई जुग के अदमी के माने की होबऽ हे ?......बेईमान....धोखेबाज..गिरहकट .....।
      मुनचुन जी कुछ सोंचे नञ चाहऽ हथ। मगर बिचार आउ घटना हटावहूँ पर उनखर दिमाग में ई तरह से आके जम जाहे जइसे ढीठ लइका लाख भगावहूँ पर, बरबस गोदी में आके बइठ जाहे। सबुनायल, नील देल, साफ कपड़ा जहाँ पेन्ह-ओढ़ के बाहर निकसेला तैयार होवऽ हलन कि रमौतरबा, उनखर तनी गो भतिजा, लहरी करे लगऽ हल। बड़का बाबू, गोदी ..... हमहूँ तोहरे साथ जइबो।-- बेलाँ गोदी लेले, दुलारले, गुजर नञ्। झक-झक साफ कपड़ा मइल होबे के भय पहिले रहऽ हल। धीरे-धीरे साफ आउर गंदा के भेद उठ गेल।..... अब तो रमौतरबो जुआन हो गेल। अप्पन संगी- साथी में का तो ओहू कहले चलऽ हे----बड़का बाबू कमाय के हाल नञ् जानऽ हथ---ओकरा के समझाबे ? तोरा छोड़, तोर बापो के हमहीं पोसलियउ। तोर बाप बुचकुनमाँ जब चारे बरिस के हल, तभिये बाबूजी चल देलन हल। ओकर पहिलहीं माय दुनियाँ से चल देलक हल। हम कमाय के जे हाल नञ् जानती होत, तो तोर बाप के आउ तोरा कइसे खिला-पिला के पोसती होत ? अब तो तोर बाप छोड़, तोहूँ कमाये लायक होलें। कमो-कजो। सब दिन हमहीं करते रहबउ ? कमाय के माने का होबऽ हे ? --फरेब ? नऽ, हरगिज नऽ--मेहनत-मजूरी से जो अरजन हो सके, ओही हक के कमाई हे। आउर ओतने में संतोस करे के चाही।
        आझ तो बहुते बात इयाद पड़ रहल हे।......जिनगी में पहिला दफे मोजफ्फरपुर गेलन हल। कँगरेस के अधिबेसन हल। तखनी जबान हलन। खादी के धोती आउ गंजी पहिरऽ हलन।-- गाँधी जी के जय--जमाहिरलालजी के जय--- नारा लगइते, हाथ में तिरंगा झंडा लेले गेलन हल।  नेता सब के भासन सुनके उनखर कान गरम हो गेल हल। ---- अँगरेजन के ई देस से निकासहीं के काम हे।
         तब से ई नियम बन गेल हल, कउनो सुराजी मिटिन पन-छो कोस के गिरिद होबे, उहाँ पहुँचना, उनखा जरूरी हल। ताजा फूल के गजरा बनैले, हाथ में तिरंगा झंडा लेले, उनखा पहूँचना एकदमे जरूरी हल। उहाँ पहूँचके दरी बिछाबे से लेके झाड़ू देबे तक के काम, चट अप्पन हाथ में ले ले हलन--- ई खेआल से कि अइसन न होय कि पूजनीय नेताजी सबके कउनो कस्ट हो जाय ?
         फिन सुराज होबे के घोसना होल हल। उनखर आँख में नींदे नञ् । साफ-सुथ्थर कपड़ा पहिनले गाम से कसबा अइलन हल। तिरंगा फहरइलन हल। लोग-बाग के बातचित सुनके, अघा के गाम लउट अइलन हल।
        सुराज आयल आउ साथे- साथे लोग के मन में बड़गो अदमी बने के साध भी आयल। पइसा बढ़ाबे के नया- नया उपाय सोंचे जाय लगल। उनखा अइसन छोटकनिया नेता, देस-सेवा के नाम पर पैरबी करे  बिलौक, सहर, राजधानी जाय लगलन। सबके पइसा कमाय के चस्का लग गेल। उनखरो घर पर पैरबी करे बाला के भीड़ लगे लगल। मुचकुन जी जायज-नाजायज पर बिचार करे लगलन हल। जायज बात ला ओहू दौड़े लगलन हल। सोंचे के बात हे, जायज पैरबी कराबे वाला केत्ते अदमी होबऽ हे ? नजायज भी चुन लेतन हल तो अभी जिनगी दोसर रहत होत। जायज पैरबी में घरो के आटा गील होबे लगल हल। ई हकीकत हल। इनखा पास खाली दीने-दुखिया के जमायत जमा होबे लगल हल। नीमन कहाये बाला लोग, इनका से कन्नी कटावे लगलन हल।
        एही सप्ताह तो फेरा में पड़लन हल। ई साल एक्को बूँद-बरखा नञ् बरसल हल। किसान आसमान ताकते रह गेलन हल, आउ धरती के करेजा दरक गेल हल। बड़का-बड़का किसान बरसात से निरास होबे पर, अप्पन-अप्पन खेन में कुइयाँ खनउलन, मोटर बइठउलन। मुचकुन जी के इयाद हे, बिलास जी सोमार के उनखा पास अइलन हल। उनखा से कहलन हल--- तोहूँ  अप्पन खेत में कुइयाँ खना लऽ, मोटर बइठा लऽ। पुरान सुराजी अदमी हऽ।  तोरा सब असानी से मिल जइतो।
------- से कइसे ?
------- तोरा के के नञ् जानऽ हे ? हाकिम, नेता, जे भी जिला में भेंटा जा हथ, तोहर हाल-चाल जरूरे पूछऽ हथ। मुचकुन जी के मन गरब से भर उठल हल। नञ् जाने कइसन भाव से उनखर गियारी भर आयल हल।
----- अभियो तलुक सचाय बचऽ हे। हमरा नियर दलिद्दर, अगियानी अदमी के भी लोग इयाद करऽ हथ।
खखस के, गियारी साफ करके बोललन हल--- की सरकार मुस्तिये में दे दे हे ?
------नञ् मुनचुन जी, ई बात नञ् हे। असान किस्त पर करजा मिल जा हे। थोड़े-थोड़े करके पूरा चुकाबे के पड़ऽ हे।
        मुनचुन जी बिचार में डूब गेलन हल। तीन-चार हजार रुपया कैसे चुकाम ? ---तीन बिगहा जमीन। हमरा मेहरारू , बाल-बच्चा नञ् हे। बाकि ओकरा से की ? हम्मर भाय, भभू, भतिजा आउ भतिजी तो हे।  सबके पेट एही खेत से भरना हे। पेट काट के करजा भरना मोसकिल बात हे। धीया-पूत्ता बाला घर में कभी केकरो की भेलो, तो केकरो की। पइसा लउटावे के सकती नञ् होत।.... करजा नञ् लौटाबे के माने होल बेइमानी करना, अप्पन देस से गद्दारी करना। माने, अपने देस के आउ गरीब बनाना।......परकट रूप में मुनचुन जी बोललन हल---- नञ् भाय, अभी हम एकर काबिल नञ् ही। भगमान अब जैसे पार लगावथ।
        दू दिन के बाद बिलास जी अप्पन काम के सिफारिस ला उनखा जिला के सहर ले गेलन हल। ऑफिस मार हाकिम-हुक्काम से भरल हल। लोहा के फाटक आउ अहाता।
       बिलास जी खटखटायल भीतर घुस गेलन हल। आउ मुचकुन जी ठकमकायल, बहरे खाड़ रहलन हल। थोड़िके देर में बिलास जी मुनचुन जी के भीतर ले गेलन हल।
       ऑफिस के भीतर देखऽ हथ---चक-चक कुरसी, टेबुल लगल हे। दिनों में सगरो बिजुली-बत्ती जर रहल हे।
------बइठिये मुनचुन जी।......आप पुराने राजनेता हैं। थाना के लोग भी आप का नाम लेते रहते हैं। आपके दर्शन पहली बार हो रहे हैं।
------जी।....ई सब अपने के बड़पन हे।
------ हाँ, बिलास जी के आवेदन पर आप थोड़ी सिफारिश लिख दें, तो उनका काम आसानी से बन सकता है।
------हाकिम, हमरा अच्छा पढ़े-लिखे नञ आवऽ हे। अँगरेजी तो एकदम्मे नञ्। हिन्दी हरुफ टो-टा के पढ़ ले ही। कयसूँ अप्पन सही बना सकऽ ही।   बस !..... जे लिक्खे पढ़े के हइ, लिख-पढ़ देहूँ। हम अप्पन सही बना देम।
------हाँ-हाँ, बस यही तो चाहिए।
------एकर बाद हाकिम की-की लिखलन-पढ़लन हल, एकर पता मुनचुन जी के नञ् चलल हल। जहाँ पर उनखा सही बनाबे ला कहल गेल, बना देलन हल।
       हाकिम एकदम्मे खुश हो गेलन हल। बिलास जी चपरासी के संग  अपन फाइल के पीछे-पीछे दोसर कमरा में चल गेलन हल। हाकिम चाह मँगइलन हल।
-----जी। हम चाह नञ् पीऽ ही।
-----हमारा मन रखने के लिए तो......
-----जब अपने की रहली हे.....।
       मुनचुन जी चाह के कप उठउलन हल। हाकिम सौ के एगो नोट अप्पन कोट के जेभी से निकास के  मुनचुन जी दन्ने बढ़उलन हल।
----- बिलास जी का काम आपकी सिफारिस से तुरंत हो जाएगा। यह आाप का हिस्सा।
----- जीऽ....। ....... गरम चाह से मुनचुन जी के सौंसे कंठ झौसा गेल हल।
------ घबराइये नहीं। अभी जो मिला, उसमें से आपका हिस्सा। फिर जब ऐसा केस लाइएगा, तो .......हाकिम मुसुका के कहलन हल।
-------जीऽ..?
         एकबैक मुनचुन जी के सब बात समझ में आ गेल हल। मुनचुन जी कुरसी छोड़के कमरा से बाहर। बड़का कमरा से अहाता में। फिन लोहा के फाटक टपके अहाता के बाहर नीम के पेड़ तरे जाके रुकलन हल। हींआ से अहाता में हाकिम के तनी ठो मइल जीप साफ देखाय पड़ रहल हल।
------ बिलास जी कन्ने हथ ? ..... एतना फरेब ?.....ई धाँधली ? .....जनता के राहत की मिलत ? ... गियारी साफ करे के बास्ते खखरलन हल
--------पिच । कफ के एगो नुक्कल टुकड़ा ठेला के सड़क पर आ गिरल हल।
--------ई ताजा घटना सौंसे के सौंसे आँख तरे घुर रहल हे।
         सुराज के पहिले सब के एक्के करम हल, एक्के धरम हल--सुराज पाना। से सुराज पइली। सुराज के बाद कौन करम ? कउन धरम ? देस में बिकास लाबे के करम। देस के मजगूत बनाबे के धरम। लोग बिकास के माने लगइलन अप्पन-अप्पन घर में पइसा के पहाड़ खड़ा करना। जरूरत हे ई पइसा के पहाड़ के ढाहे के, सब जगह बराबर से फइला देबे के........।
-----भइया, खाना परसइतो ? ..... ढेर रात बितलो।
बुचकुनमा के बोली मोलायम हे।
----नञ् हो बुचकुन, आझ भूख नञ् हे। हम्मर फिकिर तों छोड़ । तोहनी खा-पी के सूत रह।
        मुचकुन जी के एक्के बात के दुख हल।---बुचकुनवों पचास बरिस के होत। आझ तक हमरा एहू नञ् समझ सकल ? एहू का तो कहले चलऽ हे-----भइया गाँधी बनऽ हथ।..... गाँधी वाला हैसियत हइन, जे गाँधी बनऽ हथ ?
        ई मुरख के के समझावे कि गाँधीजी बने के बात कउनो हैसियत के बात हे। गाँधीजी से हजार गुना हैसियत वाला सब, कैठो गाँधी बन सकलन ? गाँधी होना कौनो हैसियत पर निरभर न हे। अरे, गाँधी तो एगो बिचार हे। गाँधी तो एगो बिचार के गंगा हे, जे ओकरा में एक डुबकी लेलक गाँधी हो गेल।
........... रमोतरबा अब जुआन होल। तनी ठो से अप्पन गोदी में लेके ओकरा पोसली। हंम्मर कौनो परभाव ओकरा पर नञ् पड़ल ? कौलेज में दू-चार लबज की पढ़ लेलक कि अब बोलऽ हे--- बड़का बाबू मिसफिट हथ।.....उनखा कमाय के लूर नञ् हे।
-------लूर सब ओकरे कपार मे आके जमा हो गेल ? ..बड़का बाबू जिनगी भर लुटउते रहलन।--- हम की लुटयली ? लुटाबे के मन रहते, ओखनिए लागी मन मारले रहली।.... ओकरा की बुझायत, लुटाबे के भी एग्गो अप्पन आनन्द होबऽ हे। जुआनी सुराज के निसा में बीत गेल।...कब बियाह होल हल ?......मेहरारू लइकयें में कब सुअरग सिधारली, कुछ होस नञ्। एखनिए के अप्पन बाल बच्चा समझली। आउ एही सब आझ ताना दे हे--- भइया गाँधी बनऽ हथ।..... बड़का बाबू मिसफिट हथ... कमाय के हिनखा लूरे नञ् हे....।
-------भइया, खा लऽ।
-------आँख उठाके देखऽ हथ, बुचकुनमा खड़ा हे। कँपसल बोली से मिनती कर रहल हे।
-------हम्मर तीन रोज के उपास।...सुन लेलऽ।....... मुचकुन जी सोंच रहलन हे---- ई किरोध केकरा पर ? बुचकुनमा, अप्पन भाय पर ? रमौतरबा, अप्पन बेटा नीयर भतिजा पर ? या गाम के लोग पर, जिनखा पर खूब परभाव नञ् पड़ सकल।.....
...... हमनी देस के ठीक दिसा नञ् दे सकली।.......ई कमी हम सबके हे।..... ई कमी हम्मर हे। किरोध तो मन के बिकार हे।.....किरोध के आग जखनी ले गंगा-जल नीयर सीतल नञ् हो जायत, अन्न-जल गरहन नञ् करम।.....
      मुचकुन जी के लगल --- ऊ अब गाँधीजी के तनी आउ नगीच आ गेलन हे

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 कविता
 
                                      अरूण हरलीवाल के दूगो कविता

                                                                           .

ताजा इतिहास में मगही लोक के महानायक दशरथ माँझी के याद के निमित्त......................

दशरथ बाबा के नामे

बाहर से,
या भीतर सेकोय
कहलक तोरा
कि अपन एक हाथ में
धइले हऽ जे छेनी,
ओकरा धर दऽ
पहाड़ के छाती पर;
अउ दोसरका हाथ में
धइले हऽ जे हथउड़ा,
छेनिया पर मारऽ ओकरा तानके
कि कान के परदा फट जाय अस्मान के.....
कि फट जाय छाती
ई राकस पासान के।

रहके मउन, बिलकुल मउन
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे,
जरूरी हे जउन,
ऊ रस्ता बनावे लगि
ई कठिन देवाल तोड़ दऽ;
गाम से गाम, अदमी से अदमी के जोड़ दऽ।
डरऽ मत,
मरऽ मत‍,
भले देह अपन छोड़ दऽ।

अजी,
दसरथ बाबा ! आज
देखके तोहर काज
ठकमुरकी मार देलक सबके,
कि सकल समाज
दाँते अँगुरी काटे
अउ लजा रहल हे आज
शहंशाह के ताज।
जुग-जुग जिंदा रहत
तोहर छेनी-हथउड़ा के अवाज,
ई अलग बात हे कि कनघटिअइले रहे
ई ढपोरसंखी राज।

बाबा,
मेहनत-मोहब्बत जिंदाबाद !
जिंदाबाद !! जिंदाबाद !!!

.

निमकहराम

जिनगीभर
बहइली हम
अप्पन देह के पसेना
इहे माटी,
इहे खेत में......
कि गेल तोहर पेट में,
मिलल तोहर खून में
नून हम्मर देह के।

लेकिन,
तूँ कइलऽ निमकहरामी--
एकेक दाना
धरती माय के,
हम्मर कमाय के
सँइत लेलऽ
तूँ अप्पन कोठी में, भाँड़ी में,
अउ एने
जाला लगल
हमरा घर हाँड़ी में।

बाबू
हमरा 'निमकहराम' मत कहऽ।
निमकहराम हम नञ् ही,
तूँ हऽ, तूँ हऽ......
तूँ ही हऽ निमकहराम।

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कहानी

                                        बिआह-बिआह
                                                                    दीनबन्धु  
                     ड़वा पर बैठल सुनरी के बुतरू में खेलल बिआह-बिआह आद आ गेल । कभी बटोरना के साथ, कभी बुधना के साथ आउ कभी मोहना के साथ। एक बेरी तो मोहना पूछिये देलक हल कि-- अञ् गे सुनरी, ई बिआह सच्चे के हे कि झूठे के ? सुनरी कहलक --अञ् रे धरछनहा, भयवे बहिन में बिआह होवऽ हे, दुअरिये पर। ई तो एगो खेला है ने रे। हमर बिआह  बड़ी दूर तोरो से  बेस छट-छट गोर लड़का से होतय, तोरे निअन नेटहा नञ् रहत, पिनपिनहवा ! मोहना कहलक--अञ् सुनरी, हम तोरा पसीन नञ् हिअउ ? साथे-साथे उठऽ- बैठऽ हँऽ, खेलऽ- कूदऽ हँऽ। आउ हम हिअय नेटहा, पिनपिनहवा। अगे हम तो बहादुर हियै बहादुर। तहिना अहरबा में डूबिये जिताँ हल, हम जो दौड़ के नञ् बचैतियौ हल तौ। अखनी बड़की सुन्नर पड़ी हो रहलीं हें। हमरो बिआह तोरा से सुथ्थर लड़की से होतै। गोर चक-चक चनरमा निअन, तोरे निअन नकटेढ़ी नञ् रहतय, ठोर लटकी। अच्छा, तो हम नकटेंढ़ी, ठोरलटकी हिअय, तो जो हमरे तोरे कट्टिस, जे बोले से गुहभात खाय, सुनरी किरिया देलक मोहना के।
         सिनेमा के रील निअन सुनरी के एकक बात नजर तर घूम गेल। सुनरी के सपना तो तउ टूटल जउ पंडित जी संखपानि ले लड़का के हाँथ ओकर पीठ पर धरैलका। बाप रे बाप ! ई हाँथ हे कि हाथी के सूँढ़, पीठ कड़कड़ा गेल।  मन करे कि भोंकार पार के कानूँ, चाहे मड़वा पर से भाग जाऊँ कनहूँ। मने मन सुनरी कपसे लगल.... बाबूजी ! तूँ हमरा जीते जी गबड़ा में गड़ देता हल, मुदा ई कसइया खुट्टा बाँध रहला हे। काहे हमरा निअन दुबर-पातर, लुच-लुच देह बाली लड़की के ई भीमसेन निअन अधवैस दोवाहा लड़का ? मुँह-हाँथ थुल-थुल, गणेश जी निअन लादा, बाप रे बाप ! ई लड़का हे कि पहाड़ ? की सूझले हल बड़का दादा के, कैसे पसीन कैलका ? कि सौंसे दुनिया में लड़कावे झर गेल हल सुनरी के हिरदा फट गेल। परबड़का दा भी की करता हल, कहाँ से लयता हल लाख-दू-लाख ? सब दिन तो नाटके-डरामा, कविता- कहानी गढ़े मे, गावे-बजावे में, दोसरा के मदद करे में आउ गाँव-गिराँव के भलाइये में समय बितैलका। थोड़े सन जोत-जमीन से की होवत हल ? सालो-बेसाल खरची चल जाय, एहे बहुत। आउ बाउओजी  की करथिन हल ? ओहो कहाँ से पइसा लयथिन हल ? दू-चार कट्ठा बेच के तो ई सब कर रहला हे बेचारा। सब बेच देथिन हल तउ खयथिन हल की ? बड़का हमनी फौरबड कहावऽ ही । ऊँच बड़ेरी खोंखड़ बाँस, करजा खयते बारहो मास। बाहर साढ़े सात हाँथ अउ घर सरपट। हमनी से बढ़ियाँ तो जने-बन हे, जे बिआह जोड़ी-पाड़ी में करे हे। जइसन लड़का, ओइसने लड़की। जुआन के जुआन , बुतरू के बुतरू आउ बूढ़-सूढ़ दोबाहा के राँड़-मसोमात। ई वर मरे, दोसर वर करे, गौरी गणेश पर अछत धरे। एगो भात गोतिया भाय के खिला देलक बस। अउ हमनी के घर में बेस-बेस सुथ्थर- सुथ्थर गरीब लड़की तो घरे बैठल आधा बूढ़ी हो जाहे। आउ राड़-मसोमात के पूछत ? हमनी के समाज तो उतरी चाहे पुतरी दुइये में उजड़ल जा रहल हे।
        सुनरी के सब बात आद आ रहल हे........एक बेरी बाबूजी आउ बड़का दा बरतुहारी गेला हल। लड़का के बाप मास्टर हला, चार-पाँच बिगहा खेत। लड़का आई०ए० में पढ़ऽ हल। फरमाइस भेल-- अढ़ाय लाख नगद, बासन- बरतन, टी वी, फ्रीज अउ एगो मोटरसाईकिल। बड़का दा आउ बाबूजी के दिने में तरेंगन जना गेल। मुँह के बात मुँहे रह गेल आउ चाहे बिस्कुट खाके निकस गेला दोसर गाँव। दोसर गाँव के लड़का के दलान पर जाके ढेर देरी उठेलू निअन बैठल रहला, तौ लालटेन आल, आउ दू लोटा पानी। फिन ओहे चाह बिस्कुट। लड़का देखलका। देखे सुने मे बेसे हल, मुदा पढ़े-लिखे में गोबर गणेश, करिआ अछर भैंस बराबर। आउ तेकरो पर तोतर, कोढ़ में खाज। बड़का दा तो नापसीन  कैलका, मुदा बाबूजी आँख छैते मछी निंगले लगला। की होतय बड़ होला पर अकिल हो जात। कुछ जोत- जमीन हे, खा कमा लेतै। लड़का के बाबू जी से पुछलका-- हमरा तो लड़का पसीन हे, मुदा लेन-देन की होबत से बताथिन। लड़का के बाप पहिले तो ना-नुकुर कैलका फेन कहलका--आवऽ हीओ घरो से बात-बिचार करले। आधा घंटा पर आके बोलला-- डेढ़ लाख नगद, बासन- बरतन आउ बुतरू के फरमाइस हे एगो फटफटिया। बड़का दा पूछ बैठलन---ई फटफटिबा पर चढ़के जीथुन कहाँ ? लड़का के बाप तमक के बोलला-- सब कहाँ जाहे ? ससुराल जात आउ कहाँ ? कुछ देर गुमकी पसरल रहल। तब बड़का दा कहलका--अच्छा, कल्ह हमनियों सब घरे जाके बात-बिचार करम।
         लड़का के बाप जे तखने से घरे दने गेला, से गेले रहला। पूस-माघ के हड़फोड़ जाड़ा, रात के नो से दस बजल, अभियो ले एकोगो कमलियो लेके नञ् अइला। बाबू जी लड़का के दुआरी पर जाके देखलका.... घर में दीआ-ढीबरी बुताल हे, एकदम्मे सून-सूना। लगऽ हे सब खा-पीके सूत रहला। ई तो बड़का फेरा हे ! एकक गो चदर से जाड़ा कैसे कटत ?-- हमर बाबूजी बोललका। बड़का दा कहलथिन कोय बात नञ् , भर भित्तर नेबारी बिछल हे, रात कटिये जात। निकाल सलाय, सुलगावऽ ही नेबारी। बाबू जी कहलथिन---- नञ्, बड़ी बोलतो लड़कावा के बप्पा। बड़का दा कहलथिन बोलत कीजे ई कनकनी में एगो ओढ़ना नञ् देलक से कि हमनी के बिमार पड़ला पर डागडर बोलाबत, कि अस्पताल ले जात ? दुआरी के बाहरी सुलगाव नेवारी, एकक आँटी जरा-जरा तापम, जबले चले। ओहे होल, दूनू बैठ के बिहान कैलका, नेबारी तापते-तापते। भिनसरबे अजान होल, अला हो अकबर......बड़का दा भी परतकाली गावऽ लगला धीरे-धीरे, नेवारी तापते। साढ़े छो बजे लड़का के बाप दुगो लोटा लेले अयला दिसा मैदान ले। नेबारी के जरैत अगजा देखते उनखर तरबा के धूर कपार चढ़ गेल। ऊ लोटा पटक के बोले लगला-- महराज तोहनियो हदे हो, सब नेबारी जरा देलहो। हल्ला-हसरात सुनके टोला-पड़ोस के दस- बीस अदमी जुट गेला। बड़का दा बोललका--अञ भाय ! ई कनकन्नी में एगो ओढ़ना नञ् देलहो, तउ बिमार पड़ गेला पर इलाज करैतहो हल ? गाँव वला लोग भी डाँटे लगल-- बरतुहार बेचारे तो ठीके तो कहऽ हथुन, अइसन कनकन्नी में एगो ओढ़ना नञ् देलहो, बिमार पड़ जिथिन हल तऽ की दवाय दारू करैतहो हल ? तूँ तो लंगटा हला, तोहरा हीं ओढ़ना नञ् हल तउ कि सउसे गाँवें लंगटा हलय, केकरो हीं से माँग के एगो कमलियो दे देतहो हल। गाँव बला सब बोलिये  रहल हल कि बाबू जी आउ बड़का दा अपन-अपन झोला उठैलका अउ चल देलका दोसर गाँव दने।
         सुनरी ई सब बात सोंचिये रहल हल कि संखपानि के विधान खतम हो गेल। संखपानि ढारे बटोरना, बुधना आउ मोहना भी आल। फेन सुनरी के सब वेदी पर लयलक, लावा छिटाल, सात फेरा होल, अँगूठा छुआल आउ गीतहारिन सब गावे लगल--'अँगूठा छुअहो छिनारी के पूता हो गेला गुलाम........।फेन पटपराय, सिन्दुर दान, पहरूबजाय होल। फेन सब सुनरी के मड़वा पर लाके बैठैलक। सूप भर गहना लेके घोंघटा चढ़ावे भैंसुर अयला। गितहारिन गावे लगल--'एते सुन्नर लाड़ो के छुछुन्दर मिलल भैंसुरा, पंचमेवा मिलल चढ़वे ले फाँक गेलय भैंसुरा, रुपइया मिलल चढ़वे ले  रख लेलकय भैंसुर......।' हा-हा, ही-ही सगरो हुलास, मुदा सुनरी के दिल हाहाकार कर रहल हे, ओकरा कखनउ बिआह-बिआह के दिरिस नजर आवे, कखनो मोहना के साथ कट्टिस, कखनउ लड़का के हाथ हाथी के सूँढ़ा निअन। ई बिआह तो ऊ बिआह-बिआह से भी खराब हे। तखने हँसऽ हलूँ, बोलऽ हलूँ ....अखने तो हिरिदा फटऽ हे।
         होल सब विधान। सुमंगली के पानी समाज के सड़ल रेवाज निअन गमक रहल हल। फेन अनामन-जनामन, कौड़ी खेलाय, खान-पान। सुनरी के एको कोर नञ् धसे...घटाघट एक लोटा पानी पी लेलक एके सोबास में अउ हो गेल लार- पोवार। लड़का के चदर में गैंठी जोड़ाले हल, पोसुआ गाय निअन आगू-आगू मालिक पगहा पकड़ले, पीछू- पीछू भोंकरइत सुनरी गाय। मुँह खोलके की कहे केकरा से.... कभी बड़का दा के मूँह देखे, जे देवाल से लग के कपस रहला हल, कभी बाबू जी के छाती लगे, माय से लपटा-लपटा के काने,कभी भाय बहिन आउ टोला-पड़ोस के दाय- माय से। फिन होवे लगल बिदागी के तैयारी.... सुनरी के तो काठ मार देलक।  कलपैत सब जने-जने ले चले, ओने जाय। बटोरना, बुधना, मोहना गली में खाढ़ होके कलपैत अपन-अपन गमछी से आँख पोछ रहल हल। तीनों गोटी लड़का के गोड़लगाय देलक आउ कहलक--मेहमान तनी सुनरी पर धेयान देहो हल , ई हमनी टोला भर के बहिन हे। बड़ी सीध-साध, आउ सब हरहरा के काने लगल। सुनरी भी घोंघा के फिहक से सबके दे‌खलक आउ कपस-कपस के काने लगल। धीरे- धीरे गाड़ी बढ़ल।                                                                 
           सुनरी अपन बाबू जी के अँगना छोड़ के ससुरार आल। फेन हियाँ भी हँसी-खुसी, कोय नञ् सुनरी के दरद जाने, जे ई बिआह के बाद होल हे अनचट्टे। सुनरी पत्थल के मूरूत नियन बैठ गेल भित्तर में, जैसे थक-हार के 
गाय कसइया के घर में बैठ जाहे।


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कविता

की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

                                 डॉ० योगेश्वर प्रसाद सिंह योगेश

की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?
मोछ पर सान हल भारत के
हे मोछ सहारा आरत के
जहिना से मोछ कटा गेलो
ई लच्छन भेलो गारत के
जब मोछ हलो तब जय भेलो
अब मोछ कटल, तब हारऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

ई मोछ मरद के चिन्हा हे
दुस्मन खातिर छरबिन्हा हे
मोछे कटबा के राजपूत
अब सिंह से बनलन सिन्हा हे
तब मोछ नञ्, तब झूठ-मूठ
की उलटे सान बघारऽ ह ?
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

पमही के रेख उठानी हे
मोछे के सरस जुआनी हे
बिनु मोछ निपनियां कहलइबऽ
मोछे से मुँह के पानी हे
तूँ मोछ कटा मेहरी बनलऽ
अब बैठल माछी मारऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

हल मोछ भीम अउ अरजुन के
काँपल दुस्मन बोली सुन के
पॄथ्वीराज के मोछ देख
भागल गोरी अँखिया मुन के
हे सगरो झगड़ा मोछे के
तूँ बिना मोछ ललकारऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

ऊ वीर शिवाजी, राना के
ऊ कुंवर मरदाना के
मोछे से दुस्मन मात भेल
तात्या टोपे अउ नाना के
तूँ मोछ कटा फिल्मी दुनिंयाँ
में जाके दाँत चियाड़ऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

हल वीर भगत के मोछे पर
आजादी के मतवालापन
वीरे रस के कविता कइलन
मोछेवाला ऊ कवि भूषण
तूँ मोछ कटा के मउगी भिर
चुपके से लत्ती झारऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

मोछे तो भेद बताबऽ हे
ई मरद अउर मेहरारू के
बाहर से धूरी-गरदा लऽ
ई काम करऽ हे झारू के
फरसाकट की फ्रेन्चकट के तो
तूँ नञ् भार सम्हारऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

ऊ मोतीलाल नेहरू के
मोछे से फिरंगी डर जा हल
ऊ महामना के मोछ
विश्वविद्यालय जहाँ पसर जा हल
गोखले, तिलक के मोछे पर
तूँ दुस्मन के ललकारऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

ई मोछ मरद के सोभा हे
जहिया से मोछ कटा रहलो
नञ् पूर रहल अब वादा हे
जब देह में नञ् दम रहलो
की झूठ-मूठ ललकारऽ ह।
की हम्मर मोछ निहारऽ ह ?

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ग़ज़ल
                                       ग़ज़ल

                  डॉ० श्रीकांत शास्त्री

सनन-सन-सन हे पुरवइया, दिया भी मिरमिरायल हे।
जरा-सा  नेह ढरका दऽअभी  अधरात  बाकी हे।।

दुनूँ किनछार तलफल हेलबालब हो रहल बधिया।
कहूँ  कनवह जरा दे दऽभरल  बरसात बाकी हे।।

तूँ कनझटके से सुनके उनका, झट से उनके हो गेलऽ।
अभी अपना में मुस्का केकरे  के बात  बाकी हे।।

इ कइसे हम कहूँ तोहरा, कि अब मधुमास आवत का।
इ टिंगुरायल टहनियन के, पकल दू पात बाकी हे।

कोई कह दे कुमुदिनी के, कली के, कल के का आसा।
अबहियों रैन-रानी के, अचल अहिवात बाकी हे।।

जुगुनुअन पर पतंगी ई, लुटौले हे अगर जिनगी।
तो पाछे सौ देवाली के, सजल बरियात बाकी हे।।

अपन सुर के तूँ सहलावऽ, अपन सुर के तूँ बहलावऽ।
टुटल दिल के सरंगी के, जुटल इ ताँत बाकी हे।।

कोई कह दे उहाँ जाके, कि मत मन उन ऊ करतन।
अमर सौगात बाकी हे, हमर औकात बाकी हे।।

गोसा जैब तूँ हमरा पर, भला कइसे इ हो सकतइ।
नयन चरचा से नाचऽ हे, मिले के बात बाकी हे।।

चढ़ा के भी चढ़ावऽ मत, बिलादोसी के फाँसी पर।
अपन दिल से हमर दिल के, खुलल तकियात बाकी हे।।


दरद के मत तूँ सहलावऽ, दरद के मत तूँ  बहकावऽ।
दरद के दिल में घोरे दऽ, बेदरदी घात बाकी हे।।

नयन के कौड़ी दाना पर, दिवाना हे जमाना ई।
अधर पौती के मोतिन के, खुलल ‌खैरात बाकी हे।।

हे सोहरत आज दुनिया में, कि बेकल हार गेलन हे।
ही हारल, हम भी मानऽ ही, मगर एक मात बाकी हे।।

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 ग़ज़ल

                        मृत्युंजय मिश्र करुणेश

बड़ी महफिल में चाहल जा रहल हे,
ग़ज़ल हम्मर सराहल जा रहल हे ।

लुटउली रस ई हम बरबाद होके,
ई केकरो से न थाहल जा रहल हे

झोपड़िये बस उजाड़ल जा रहल हे,
महल उनखर न ढाहल जा रहल हे।

कहाँ जाएत पोखरिया के मछरिया,
सभे पनियाँ उपाहल जा रहल हे।

सपनमा सब कुआँरे के कुआँरे,
कहाँ अब तक बिआहल जा रहल हे।

ओही रहिया, ओही राहे भटकते,
ऊ राही जइसे जा हल, जा रहल हे।

सहे के गम के हे हमरा में दम केतना,
जुलुम कर-कर के थाहल जा रहल हे।

तोरा हक हो, पिअऽ छक-छक के अमरित,
हमर कंठे में तो हलाहल जा रहल हे।

बड़ी मुसकिल हे जियल शायर के जिनगी,
कि मुसकिल से निबाहल जा रहल हे।

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गीत

देवता

                                  जयराम देवसपुरी

घर ही में देवता मनइबै।
तिरिथ करे बाहर नञ् जइबै।।

सास हम्मर गौरा, ससुर जी महादेव,
दुनहुँ पर नेह जल चढ़इबै।
तिरिथ करे बाहर नञ् जइबै।।

सैंयाँ हम्मर रामचनर, लछुमन देवरबा,
दुनहुँ के आरती देखइबै।
तिरिथ करे बाहर नञ् जइबै।।

गोतिन मोर सरसती , लछमी ननदिया,
दुनहुँ संगे नेहिया लगइबै।
तिरिथ करे बाहर नञ् जइबै।।

तीनो तिरलोक सखि हमरे अंगनमाँ,
चारों धाम जखनैं सैंयाँ किसनमा,
एजइ गरदे में देहिया लोटइबै।
तिरिथ करे बाहर नञ् जइबै।।
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समीक्षा


                                                        पंछहरी: एक नजर में

                                                                                                            डॉ० राधानंद सिंह

            मगही साहित्य सम्मेलन अछुआ से परकासित मगही महिनवारी पंछहरी मगही भासा, साहित्य, समाज आउ संस्कृति के अपने में समेटले हे। अगस्त २०११ में एकर पहिला अंक प्रवेशांक के रूप में परकासित होयल हे, जेकर संपादक मगही के होनहार साहित्यकार अछूत भानू आउ पवन तनय हथन। मगही महिनवारी के संरक्षक डॉ० रामप्रसाद सिंह, प्रो० अवधेश कुमार सिन्हा आउ डॉ० दिलीप कुमार हथन। संपादक मंडल में मगही के सात साहित्यकार सप्तऋषि मंडल नियन विराजमान हथ। अइसन में पंछहरी के आवेवाला दिन सुखद रहत, एकरा में कउनो शक के गुंजाइस कहूँ से नञ् हे।
         पटना जिला के अछुआ एगो अइसन जगह हे, जहाँ लम्हर समय से मगहिया साहित्यकार सभे मगही माय के अचरा भर रहलन हे-- मगही के किताब निकाल के, मगही के पत्रिका निकाल के, मगही के काजकरम करके.....ओकरे में एगो आउ कड़ी जुट गेल हे--पंछहरी के रूप में। ई बात सही हे कि भासा में मगही के पत्रिका बड़ी कम निकल रहल हे। अइसन में पंछहरी के परकासन मगही लेल एगो बड़गर बात हे। जरूरत ई बात के हे कि ई बराबर समय से बिना कउनो रोक ठोक के निकलते रहे। पंछहरी दुबर पातर हे कि छोट एकरा से कउनो मतलब नञ् हे। पंछहरी निकलते रहे ई बड़गर बात हे।
        प्रवेशांक के सम्पादकीय में संपादक निमन सबाल उठौलन हे। पात्रता परीक्षा में मैथिली आउ भोजपुरी हे, जब मगही के कउन कसुर जे एकरा न रखल गेल हे ? ई राजनीति के गंदा खेला कब ले चलत ? मगहियन के निंन से जागे के अपील संपादक करलन हे, जेकर जेतने तारिफ करल जाए, कम हे। उमेश प्रसाद उदय के कविता कइसे खुश रहत मेहरारू के व्यंग्य देखे काबिल हे---
     जउन मरदा न जुआ खेले आउ पीये न दारू।
     ई कलयुग में ओकर कइसे खुस रहत मेहरारू।।
         संपादक अछूत भानु घुम्कड़ी के मूल्यांकन नया अंदाज में करलन हे। डॉ० दिलीप जी के पटना एगो दर्शन पटना के कल आउ आज के जानकारी देलन हे। माने मगही महिनवारी पंछहरी जेकर सहयोग राशि पाँच रुपइया हे, पढ़े आउ गुंणे काबिल हे।

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रपट

                                 हिन्दी पखवारा समापन सह कवि सम्मेलन के आयोजन

           १८ सितम्बर २०११ रविवार के दिन सरस्वती शिशु मंदिर, सीढ़ी घाट, बख्तियारपुर, पटना में हिन्दी पखवारा समापन सह कवि सम्मेलन के आयोजन भेल, जेकरा में हिन्दी आउ मगही के पटना, नालन्दा, नवादा, बाढ़, लक्खीसराय सहित मगध के कवि आउ साहित्कार के जुटान होल। दीप प्रज्वलन, पुष्प अर्पण के बाद भईया बहन के वन्दना आउ राष्टगान से काजकरम के सुरूआत भेल। रामाश्रय झा  अतिथि सब के परिचय करैलथिन। उनखर अतिथि सोवागत  के बाद हिन्दी मगही के विद्वान दीनबन्धु के अध्य‌क्षता में काजकरम शुरू भेल। विषय प्रवेश करइत रामाश्रय झा अपन उदबोधन में कहलथिन कि हिन्दी कश्मीर से कन्याकुमारी तक के भासा हे, ई राष्ट्र के  भासा, समता के भासा हे। एकरा बढ़ावा देवे के काम जनता, सरकारी सेवक, जनप्रतिनिधि आउ सरकार के हे। हिन्दी दिवस मनावे से हिन्दी समृद्ध नञ् होत, बलूक हिन्दी में सब काम होवे के चाही, हिन्दी के सब लोक भासा समृद्ध कर रहल हे, ओकरा में मगही के योगदान हे। हिन्दी के विकास के बाधा पर साहितकार राजकुमार प्रेमी, जननेता वशिष्ठ नारायण सिंह आउ कय लोगन अपन-अपन विचार देलथिन।

कवि सम्मेलन

          दोसर सत्र में कवि सम्मेलन के आयोजन भेल, जेकरा में हिन्दी मगही के कवि दीनबन्धु, राजकुमार प्रेमी, व्यंग्यकार उदय कुमार भारती, रंजीत कुमार, प्रमोद कुमार अंजन, भाई बालेश्वर, राज किशोर उन्मुक्त, शैलेश कुमार पुष्प, हरिद्वार सिंह प्रबुद्ध, गौरी शंकर मधुर, शिवशंकर किंकर, रामाश्रय झा, आचार्य ओम प्रकाश, सुभाष, नीतु देवी, कविता पाठ कइलन। राजकुमार प्रेमी, दीनबन्धु, व्यंग्यकार उदय कुमार भारती, रंजीत कुमार के बार-बार कविता सुनावे के आग्रह भेल। गंगा मईया के तट पर भारी बरखा में दिनभर काजकरम चलल। काजकरम के बाद भूकम्प के झटका एकरा आउ ऐतिहासिक बना देलक।


सम्मान
        
                     काजकरम के तेसर सत्र में पाँच गो कवि के अंगवस्त्रम् आउ भेंठ देके सम्मानित करल गेल। बेस गीत लिखे ले दीनबन्धु, गजल ले राजकिशोर उन्मुख, व्यंग्य विधा ले उदय कुमार भारती, नारी सशक्तिकरण ले राजकुमार प्रेमी आउ हास्य ले रंजीत कुमार के सम्मानित करल गेल। धन्यवाद ज्ञापन मंदिर के प्रधानाचार्य परशुराम सिंह जी कैलन।

                                                           ००००००००००००००००००००००००००

                                       मगही मनभावन मगही ई-पत्रिका के लोकार्पण

         २३ सितम्बर, राष्ट्रकवि दिनकर के जयन्ती के मोका पर हिसुआ के पाँचू गढ़ स्थित हिन्दी-मगही साहित्यिक मंच शब्द साधक के कारजालय में मगही मनभावन मगही ई-पत्रिका के लोकार्पण समारोह पूर्वक भेल। समारोह में क्षेत्र के साहित्यकार, पत्रकार, अधिकारी, प्रोफेसर, शिक्षक आउ समाजसेवी के जुटान भेल। मगही के वरिष्ठ कवि दीनबन्धु, टी एस कॉलेज के प्राचार्य सुनील सुमन, बी डी ओ सच्चिदानन्द सिन्हा, सी ओ शैलेश कच्छप सभे मिल के काजकरम के उद्घाटन  कइलन। दिनकर के सरधासुमन अर्पण करे के बाद पत्रिका के लोकार्पण गुगल के क्लिक करके कइल गेल। काजकरम के अध्यक्षता दीनबन्धु आउ संचालन मिथिलेश कुमार सिन्हा जी कइलन। उदय भारती मगही मनभावन के उद्देश्य पर रौशनी डालत कहलन कि मगही के प्रचार-प्रसार आउ मगही के नयका पीढ़ी तक पहुँचावे ले एकरा इन्टरनेट पर रखल गेल हऽ। मगही हम्मर मात-पिता , दादा-दादी के बोली हे, हम्मर माटी के बोली हे। एकरा में हमर संस्कॄति बसऽ हे, ई बुद्ध, महावीर, अशोक, राहुल सांस्कॄतायन, कच्चान के बोली हे। बिहार, झारखण्ड, बंगाल आउ देश के ब‌‌ड़गर हिस्सा में ई बोलल जा हे, एकर गौरवपूर्ण इतिहास हे, एकरा पुरनका सम्मान मिले के चाही। एकरा पत्रिका के रूप में देखे के सपना बरसों से हल पर अर्थ के अभाव आउ कै गो वाधा के चलते ई नञ् होल। इन्टरनेट के जरिये एकरा अपने तक पहुँचावे के प्रयास हे। पहुँचल अतिथि-वक्ता खुशी आउ उत्साह से पत्रिका के स्वीकार कइलथिन आउ बधाई देलथिन। मगही के मगध के प्राचीन भाषा आउ संस्कॄति के रक्षक बतइलथिन। समारोह में मगही के इतिहास आउ आझ के एकर स्वरूप पर चरचा होल।
           उदॄधाटनकर्ता, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, प्रोफेसर डॉ० मनु जी रॉय, डॉ० शिवेन्द्र नारायण सिंह, डॉ० संजय, उपेन्द्र पथिक, अरूण देवरसी, दीनबन्धु, मिथिलेश सिन्हा आउ अन्य अतिथि अपन संबोधन में मगही के समृद्ध करे के संकल्प आउ आह्वाहन आउ मगही मनभावन के समर्थन करे के बात कहलथिन। नेट पर एकरा आवे से युवा लोग रूचि जरूर लेथिन, ऐसन कहल गेल।
         मौके पर कवि प्रवीण कुमार पंकज, अनिल कुमार, शफीक जानी नादाँ, शादिक नवादवी, प्रो० जयनन्दन, प्रो० जगत, कॄषि पधाधिकारी राज बिहारी, पत्रकार राजेश मंझवेकर, अशोक सिेह, आलोक कुमार, सर्वेश कुमार गौतम, सुनील कुमार,विजय कुमार, रोहित कुमार पंकज, ओंकार शर्मा, प्रेम कुमार साहित्यप्रेमी अरविन्द कुमार, तुंगी मुखिया विनोद कुमार आउ दरजनो गणमान्य मगहिया उपस्थित हलथिन।


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सनेस मिलल


       ई० नारायण प्रसाद, सुमंत, राजेश मंझवेकर के सनेस मिलल। एकरा ले उनखा सभे के धन्यवाद आउ अभार। मगही मनभावन के सदस्य बनेवाला ई० नारायण प्रसाद, सर्वेश कुमार गौतम, राजेश चौधरी, राजेश्वर कुमार, राजेश मंझवेकर के धन्यवाद साथे-साथ सहयोग आउ सुझाव के आसा।

                                                                           सनेस 1.

       मगही साहित्य ई-पत्रिका मगही मनभावन के पहिला अंक इंटरनेट पर पढली, जीउ जुड़ा गेल ।इंटरनेट के जमाना में ई जरूरी हल। भाई उदय भारती जी तोहरा साथे पथिक जी के बहुत-बहुत बधाई!
 सुमंत,टोला-टाटी,गयाजी
SUMANT द्वारा मगही साहित्य ई -पत्रिका अंक १ पर 10/4/11 को


                                                                          सनेस  2.
       maghi manbhavan ego sahsik aur yugantkari prayas he. ham ekar tah-e-dil se swagat kara hi. bhai uday badhai ke patra hath je jan bhawna ke kheyal kar ke etna badgar karj kailan he, unka alag se sadhuwad.sri jairam, karu babu aur dinbandhu ji jaisan sashakta hastakshar ke ek sath dewe khatir v dhanyawad. agil ank ke besabri se pratiksha me----
Rajesh Manjhwekar
Rajesh Manjhwekar द्वारा मगही साहित्य ई -पत्रिका अंक १ पर 9/26/11 को

                                                                           सनेस 3.

            कवि उदय भारती जी, मगही ब्लॉग प्रारम्भ करने के लिए बधाई ! मगही सम्बन्धी आपसे बहुत कुछ आशाएँ हैं।
            हम्मर सुझाव ई हइ कि मगही ई-पत्रिका के अलगे ब्लॉग बनावल जाय । ओकरा में सर-समाचार या आउ दोसर चीज नञ घुसावल जाय । मतलब कि ऊ ई-पत्रिका ही होवे के चाही । यथासम्भव बाकी मगही साहित्यकार सब के एकरा बारे परिचित करावे के चाही आउ एकरा लगि अप्रकाशित मगही रचना भेजे ल निवेदन करे के चाही ।

शुभ कामना सहित नारायण प्रसाद
नारायण प्रसाद द्वारा अब इंटरनेट पर मगही ई-पत्रिका पर 9/24/11 को
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निहोरा  

. मगही मनभावन पर सनेस आउ प्रतिक्रिया भेजे घड़ी अपन ई-मेल पता जरूर लिखल जाय, ताकि ओकर जबाब भेजे में कोय असुविधा नञ् होवै।

२. मगही मनभावन ले रचना ई-मेल से इया फैक्स से चाहे हिन्दी मगही साहित्यिक मंच शब्द साधकके कारजालय, हिसुआ पहुँचावल जा सकऽ हे।

शब्द साधक
हिन्दी मगही साहित्यिक मंच
हिसुआ, नवादा (बिहार)

. रचना मगही साहित के प्रचार-प्रसार के लेल इहाँ रखल गेल हऽ। कौनो आपत्ति होवे पर हटा देल जात।

रचना साभार लेल गेल

उपास--निरंजना स्मारिका-१९८३, मगही अकादमी, बिहार।
दशरथ बाबा के नामे, निमकहराम-- कहाँ गेल गाँव, मगही कविता सेंगरन, अरूण हरलीवाल।
ग़ज़ल, श्रीकान्त शास्त्री-- मगही पत्रिका-जुलाई २००२।
ग़ज़ल, मृत्युंजय मिश्र 'करुणेश'-- मगही पत्रिका २००१।
की हम्मर मोछ निहारऽ-- हम्मर मोछ निहारऽ, मगही व्यंग्य काव्य, योगेश्वर प्रसाद सिंह 'योगेश'
पंछहरी---टोला-टाटी, मगही पत्रिका सितम्बर २०११।
                                                              
                                                                        ooooo

2 टिप्‍पणियां:

  1. लगऽ हइ कि "नयँ, नञ, नञ्, नय, नई,नईं, नै, नैं" जइसन विविध वर्तनी के स्थान पर अब धीरे-धीरे लोग "नञ" या "नञ्" के प्रयोग जादे करे लगलथिन हँ । लेकिन "नञ" आउ "नञ्" के उच्चारण तो हिन्दी या मगही शैली में एक्के होतइ । ओहे से हम्मर सुझाव ई हइ कि बेकार के एगो हल्-चिह्न टाइप करे के काहे ल बखेड़ा लेल जाय, "नञ" लिखला से चलतइ । एहो बात पर ध्यान देवे के जरूरत हइ कि "न, नऽ, ना" (सन्दर्भ - मगही पत्रिका, नवांक-3, जुलाई-अगस्त-2011, पृ॰61) आउ "नञ" के प्रयोग अलग-अलग होवऽ हइ । जैसे - "ऊ न तो खा हइ, न पीयऽ हइ ।" ई वाक्य में "न" के जगह पर "नञ" के प्रयोग नञ कइल जा सकऽ हइ ।

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  2. बरबीघा के कार्यक्रम में अपने के बारे में जानकारी मिलल हल और आज तोरा के खोज के हम निकाल लिली, मुदा एक बात है कि तोर इ प्रयास बहुत सराहे जोग है..

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